Ardhsatya.....


चक्रव्यूह में घुसने से पहले,
कौन था मैं और कैसा था,
यह मुझे याद ही ना रहेगा.

चक्रव्यूह में घुसने के बाद,
मेरे और चक्रव्यूह के बीच,
सिर्फ एक जानलेवा निकटता थी,
इसका मुझे पता ही ना चलेगा.

चक्रव्यूह से निकलने के बाद,
मैं मुक्त हो जाऊं भले ही,
फिर भी चक्रव्यूह की रचना में
फर्क ही ना पड़ेगा.

मरुँ या मारून,
मारा जाऊं या जान से मार डालूं.
इसका फैसला कभी ना हो पायेगा.

सोया हुआ आदमी जब
नींद से उठकर चलना शुरू करता है,
तब सपनों का संसार उसे,
दोबारा दिख ही ना पायेगा.

उस रौशनी में जो निर्णय की रौशनी है
सब कुछ समान होगा क्या?

एक पलडे में नपुंसकता,
एक पलडे में पौरुष,
और ठीक तराजू के कांटे पर
-- अर्धसत्य.

Keep your soul alive
-- Kalingaa...

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