Snippets...

मंज़िल तो मिल ही जाएगी, भटक कर के ही सही... गुमराह तो वो हैं, जो घर से निकले ही नहीं...

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ये नूर कैसा है, राख का सा रंग पहना है...... हर एक मोड़ पे बस दो ही नाम मिलते हैं, मौत कह लो अगर मुहब्बत ना कहने पाओ.....


-- Kalingaa...

Khubsurat woh....

Written for someone who was very close to me....

खूबसूरत...

..वो लब जो प्यारी बातें करते हैं...

..वो मुस्कुराहट जो दूसरों के चेहरों पे मुस्कान ला दे...

..वो दिल जो किसी के दर्द को समझे, किसी के लिए तडफे...

..वो ज़ज़्बात जो किसी का अहसास बनें...

..वो अहसास जो किसी के दर्द की दवा बनें..

..वो बातें जो किसी का दिल ना दुखावें...

..वो आखें जिनकी पाक़िज़गी से बेदर्द ज़माना सहमे...

..वो आँसू जो अपना-पराया ना समझ किसी के दुख में बह जाएँ...

..वो हाथ जो किसी को मुश्क़िल वक़्त में थाम ले...

..वो क़दम जो किसी की मदद के लिए बढ़े हों...

..वो सोच जो किसी के भले के लिए हो...

.. वो 'कलिंग' जो आज भी बिना अपनो के खंडहर बना हुआ है...

..वो ख्याल जो औरत को खुदा की नेमत माने...

..वो महबूब जो हर पत्थर को धड़कना सीखने के लिए ज़िंदा हो...

..वो इंसान जिसको खुदा ने बंदगी अता की हो...

..वो रात जब महबूब एक दूसरे से मिल दुनिया को भूल जातें हो...

-- Kalingaa...

Phir Kuch Alfaz Jaam Ke Naam....

दिन भर धूप का परबत काटा, रात को पीने निकले.... कसम तुमको जो ज़ाम से एक बूँद भी छलके....

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मत हो नाराज़, मत हो खफा, मेरे साक़ी... जीतने हैं मैं आँसू पिए, उतनी शराब नहीं पी...

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ज़िंदगी हज़ार मोड़ ले, जीतने चाहे आयाम ले... प्यार एक बार होता है, बाकी सब निभाने के तरीके हैं...

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यह ज़ुबान हमसे सी नहीं जाती... ज़िंदगी है के जी नहीं जाती...

एक आदत सी बन गयी है तू... और आदत कभी नहीं जाती...

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ज़िंदगी तेरे हर एक मोड़ पे करामात नज़र आते हैं....
उम्मीद कुछ करता हूँ, कुछ और ही हालात नज़र आते हैं....

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खता हो गयी है तो सज़ा सुना दो, दिल मे इतना दर्द क्यो है वजह बता दो....
देर हो गयी है याद करने मे ज़रूर,लेकिन, तुमको भुला देंगे ये ख्याल दिल से मिटा दो !

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-- Kalingaa...

Ek Pagli si Ladki...

Sometime we remember the lines written by someone else which echoes our feeling perfectly and precisely even when we struggle to utter a sigh... This doesn't mean that we can't express but we are not able to collect our thoughts as we are driven by emotions at that point of time. We wish we can speak and bring the conversation but had to resort to silence and wish that others will gauge our expressions by looking into our eyes. Technology of ditant communication has struck this possibility so bad that most of us now give up & wish for loss rather than waiting for it to happen....

One such poem is written by Kumar Vishwas which would have given me a chance to convey something....
अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आँसू के संग होते हैं,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं, सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार बार दोहराने से सारी यादें चूक जाती हैं,
जब उँच-नीच समझने में माथे की नस दुख जाती हैं,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मारना भी भारी लगता है...

जब पोथे खाली होते हैं, जब हरफ़ सवाली होते हैं,
जब ग़ज़लें रास नहीं आतीं, अफ़साने गाली होते हैं.
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जाता है,
जब सूरज का लसक़र छत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,
जब कॉलेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख माना करने पर भी पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मारना भी भारी लगता है...

जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आँखों के नीचे छाई दिखाई देती है,
जब बडकी भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो दिनभर, कुछ सपनों का भी सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते हैं, हम जाते हैं, घबराते हैं,
जब साड़ी पहने एक लड़की का एक फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमे मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मारना भी भारी लगता है...

दीदी कहती हैं उस पगली लड़की की कुछ औकात नहीं,
उसके दिल में भैया तेरे जैसे प्यारे जज़्बात नहीं,
वो पगली लड़की नौ दिन मेरे लिए भूखी रहती है,
चुप-चुप सारे व्रत करती है, पर मुझसे कभी ना कहती है,
जो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ,
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा-बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा,
यह कथा-कहानी किस्से हैं, कुछ भी तो सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लड़की के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है...

- डॉक्टर कुमार विश्वास
-- Kalingaa...

Point ki baat....

Dad to Son : "Success is when Signature turns into an Autograph."



Son : "No Dad. Success is when Signature turns into Glenfiddich or Glenlivet."


-- Kalingaa...

Start Again...


I looked at world through glass,
Watching its people pass,
I thought nobody would touch me,
That I'm safe.

But the world blew cold, in the depths of my soul,
The deed was done, it was too late,
Menacingly ruthless souls walked all over me,
Crushing past me as if I am a nobody nowhere.

Where I never thought they would not upset me,
I was too late for they hurt me and made me cry.
I ran away from the world, to hide in the corners of my mind alone,
Thinking I could save my heart, but I could'nt n' it bled.

Now -
In a room without windows, in the company of shadows,
I know they wont leave me, they'll take me in,
Emotionally shattered, for the pain mattered, I did let it upset me.

But, now having my lessons learnt,
I've decided, I'll START AGAIN...

- Kalingaa...

Shaayad Zindagi Badal Rahi Hai (शायद ज़िंदगी बदल रही है!!)


जब मैं छोटा था,
शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी..
मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वो रास्ता,
क्या क्या नहीं था वहां,
चाट के ठेले,
जलेबी की दुकान,
बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब वहां "मोबाइल शॉप",
"विडियो पार्लर" हैं,
फिर भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है....
जब मैं छोटा था,
शायद शामें बहुत लम्बी हुआ करती थीं...
मैं हाथ में पतंग की डोर पकड़े,
घंटों उड़ा करता था,
वो लम्बी "साइकिल रेस",
वो बचपन के खेल,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती,
दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है.
शायद वक्त सिमट रहा है..
जब मैं छोटा था,
शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुजूम बनाकर खेलना,
वो दोस्तों के घर का खाना,
वो लड़कियों की बातें,
वो साथ रोना...
अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है,
जब भी traffic signal पे मिलते हैं
"Hi" हो जाती है,
और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,
होली, दीवाली, जन्मदिन,
नए साल पर बस SMS आ जाते हैं,
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं..
जब मैं छोटा था,
तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग,
पोषम पा, कट केक,
टिप्पी टीपी टाप.
अब internet, office से फुर्सत ही नहीं मिलती..
शायद ज़िन्दगी बदल रही है.
जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है..
जो अक्सर कबरिस्तान के बाहर
बोर्ड पर लिखा होता है...
"मंजिल तो यही थी,
बस जिंदगी गुज़र गयी मेरी
यहाँ आते आते"
ज़िंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है...
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने में ही है..
अब बच गए इस पल में..
तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में
हम सिर्फ भाग रहे हैं..
कुछ रफ़्तार धीमी करो,
मेरे दोस्त...

-- Kalingaa...

Nakaami (नाकामी)....

हमारी नाकामी के सबब हमको हर बार मिले...
खुशी बांटने चले थे, अब हैं शिकवे और गिले...

था राख का ढेर, फिर भी हम अपना दामन जला बैठे..
मिलती थी जो चीज़ ज़माने में कम, वो माँग बैठे..
पत्थर दिल थे हम, भूल से उनसे दिल लगा बैठे..
भूलना था उनको, उनकी यादों को सीने से लगा बैठे..
करना था आबाद ख्वाबों का शहर, कलिंग का शमशान बना बैठे..

लगता है रात बाकी है तभी फूल बगिया में नहीं खिले...
हमारी नाकामी के सबब हमको हर बार मिले...
-- Kalingaa...

Qaraar (आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है)....

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है
ताक़ते-बेदादे-इन्तज़ार नहीं है

देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले
नश्शा बअन्दाज़-ए-ख़ुमार नहीं है

गिरिया निकाले है तेरी बज़्म से मुझ को
हाये! कि रोने पे इख़्तियार नहीं है

हम से अबस है गुमान-ए-रन्जिश-ए-ख़ातिर
ख़ाक में उश्शाक़ की ग़ुब्बार नहीं है

दिल से उठा लुत्फे-जल्वाहा-ए-म'आनी
ग़ैर-ए-गुल आईना-ए-बहार नहीं है

क़त्ल का मेरे किया है अहद तो बारे
वाये! अगर अहद उस्तवार नहीं है

तू ने क़सम मैकशी की खाई है "ग़ालिब"
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है

Kitna Akela (कितना अकेला)....

संघर्ष में टूटा हुआ,
दुर्भाग्य से लूटा हुआ,
परिवार से छूटा हुआ, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं!

भटका हुआ संसार में,
अकुशल जगत व्यवहार में,
असफल सभी व्यापार में, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं!

खोया सभी विश्वास है,
भूला सभी उल्लास है,
कुछ खोजती हर साँस है, कितना अकेला आज मैं!
कितना अकेला आज मैं!

-  हरिवंशराय बच्चन
-- Kalingaa...

Jab Tum Juda Huye (जब तुम जुदा हुए)...

जब हम तुम जुदा हुए
ख़ामोश थे लब पलकों ने कहा था कुछ
आँखों में समन्दर भरना किसने सिखाया
कुछ याद है तुम्हें
याद तो करो
नीम के पेड़ के नीचे क्या खोया था?
मैंने ही तो छुपा ली थी तुम्हारी पायल
तुम बहुत देर तक रोती रही थीं और मैं
मन ही मन हँसता रहा था,

और वो चाँद वाली बात
झूठ बोला था तुमसे कि चाँद मेरा दोस्त है
मुझसे मिलने आता है आधी रात को
चाँद से बातें करने के लालच में तुम छुप-छुपकर मेरी छत पर आया करती थीं,

याद तो होगा झीलों के किनारे पहरों गुमसुम बैठे रहना
झूठ ही तो कह दिया था कि दोपहर को झील किनारे परियाँ आती हैं
और
तुम थीं कि चली आती थीं धूप में

कितना झूठा था मैं
तुम भी तो झूठी थीं,
सब कुछ समझकर भी अन्जान बनी रहती थीं...
तुम मुझसे भी ज़्यादा झूठी निकलीं
कभी नहीं बताया कि छोड़कर चली जाओगी एक दिन
अकेला कर दोगी मुझे
झूठी तुम चली गईं

अब सच मेँ चाँद मेरा दोस्त है
बातें करता है मुझसे
और
झील किनारे परियाँ भी आती हैं मिलने
मगर
अफसोस अब तुम नहीं हो मेरे पास
मगर तुम्हारी पायल आज भी है,
ये झूठ नहीं बोलती क्योंकि अब मैं सच बोलने लगा हूँ.....

रात सुबह के इंतज़ार मेँ ख़त्म हो जाती है
और
दिन भर रात होने का इंतज़ार करता हूँ

गुज़र रहा था उधर से कल फिर तुम्हारा घर देखा
उजड़ा सा बरामदा
अधखुली खिड़की
धूल मेँ डूबा दरवाज़ा
गमले मे लगा सूखा गुलाब
अधखुली आँखों मेँ तैरता ख़्वाब,

अब रोज़ ही उधर से गुज़रने लगा हूँ
मगर
अब कोई ख़त
या
फूल ऊपर से नहीं गिरता
फिर भी मैँ झुक जाता हूँ यूँ ही,

जाने वाले तू सब ले गया पुराने दिन, ख़ुशबू, रंग, तितली, सुकून और
न जाने क्या-क्या ?

- सिराज फ़ैसल ख़ान

-- Kalingaa...

Thoughts...

न तुझको मात हुई न मुझको मात हुई, सो अबके दोनों ही चालें बदल के देखते हैं.....
जुदाइयां तो मुक़द्दर हैं फिर भी जाने सफ़र, कुछ और दूर ज़रा साथ चलके देखते हैं ....

-- Kalingaa...

Jo Chal Sako to Koi aisi Chaal chal jaana... (जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना....)

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना
मुझे गुमाँ भी ना हो और तुम बदल जाना

ये शोलगी हो बदन की तो क्या किया जाये
सो लाजमी है तेरे पैरहन का जल जाना

तुम्हीं करो कोई दरमाँ, ये वक्त आ पहुँचा
कि अब तो चारागरों का भी हाथ मल जाना

अभी अभी जो जुदाई की शाम आई थी
हमें अजीब लगा ज़िन्दगी का ढल जाना

सजी सजाई हुई मौत ज़िन्दगी तो नहीं
मुअर्रिखों ने मकाबिर को भी महल जाना

ये क्या कि तू भी इसी साअते-जवाल में है
कि जिस तरह है सभी सूरजों को ढल जाना

हर इक इश्क के बाद और उसके इश्क के बाद
फ़राज़ इतना आसाँ भी ना था संभल जाना
शोलगी - अग्नि ज्वाला, मुअर्रिख - इतिहास कार, मकाबिर - कब्र का बहुवचन, साअते-जवाल - ढलान का क्षण

Sabse Alag (भीड़ में सबसे अलग)....

भीड़ में सबसे अलग, सबसे जुदा चलता रहा
अंत में हर चलने वाला एकला चलता रहा

रात भर चलते रहे सपने, यहाँ तक ठीक है
ये न पूछो—रात भर सपनों में क्या चलता रहा

रुक गए हम लोग, इस कारण ही पीछे रह गए,
हम रुके लेकिन, हमारा रास्ता चलता रहा

कौन अच्छा है, बुरा है कौन, इसमें मत उलझ
ये तो दुनिया है, यहाँ अच्छा-बुरा चलता रहा

तीन अक्षर वासना को एक कमरा चाहिए
ढाई आखर प्यार का पंछी खुला चलता रहा

जो पुराना था, उसी में करके थोड़ी काँट-छाँट
हर महीने ही कोई फ़ैशन नया चलता रहा

ज़िन्दगी में सिर्फ ऐसे लोग ही कुछ कर सके,
जिनके सँग ‘करने या मरने’ का नशा चलता रहा

Ghazal Ki Sachchi Kitaab (ग़ज़ल की सच्ची किताब)

यूं ही बेसबब ना फिरा करो, कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिजाज का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जाएगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो

मुझे इश्तहार सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियां
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो

-- Kalingaa...

गब्बर सिंह का चरित्र चित्रण (Characterization of Gabbar Singh)

Dedicated to 1st April Tradition.

1. सादा जीवन, उच्च विचार: उसके जीने का ढंग बड़ा सरल था. पुराने और मैले कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी, महीनों से जंग खाते दांत और पहाड़ों पर खानाबदोश जीवन. जैसे मध्यकालीन भारत का फकीर हो. जीवन में अपने लक्ष्य की ओर इतना समर्पित कि ऐशो-आराम और विलासिता के लिए एक पल की भी फुर्सत नहीं. और विचारों में उत्कृष्टता के क्या कहने! 'जो डर गया, सो मर गया' जैसे संवादों से उसने जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला था.

२. दयालु प्रवृत्ति: ठाकुर ने उसे अपने हाथों से पकड़ा था. इसलिए उसने ठाकुर के सिर्फ हाथों को सज़ा दी. अगर वो चाहता तो गर्दन भी काट सकता था. पर उसके ममतापूर्ण और करुणामय ह्रदय ने उसे ऐसा करने से रोक दिया.

3. नृत्य-संगीत का शौकीन: 'महबूबा ओये महबूबा' गीत के समय उसके कलाकार ह्रदय का परिचय मिलता है. अन्य डाकुओं की तरह उसका ह्रदय शुष्क नहीं था. वह जीवन में नृत्य-संगीत एवंकला के महत्त्व को समझता था. बसन्ती को पकड़ने के बाद उसके मन का नृत्यप्रेमी फिर से जाग उठा था. उसने बसन्ती के अन्दर छुपी नर्तकी को एक पल में पहचान लिया था. गौरतलब यह कि कला के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ता था.

4. अनुशासनप्रिय नायक: जब कालिया और उसके दोस्त अपने प्रोजेक्ट से नाकाम होकर लौटे तो उसने कतई ढीलाई नहीं बरती. अनुशासन के प्रति अपने अगाध समर्पण को दर्शाते हुए उसने उन्हें तुरंत सज़ा दी.

5. हास्य-रस का प्रेमी: उसमें गज़ब का सेन्स ऑफ ह्यूमर था. कालिया और उसके दो दोस्तों को मारने से पहले उसने उन तीनों को खूब हंसाया था. ताकि वो हंसते-हंसते दुनिया को अलविदा कह सकें. वह आधुनिक यु का 'लाफिंग बुद्धा' था.

6. नारी के प्रति सम्मान: बसन्ती जैसी सुन्दर नारी का अपहरण करने के बाद उसने उससे एक नृत्य का निवेदन किया. आज-कल का खलनायक होता तो शायद कुछ और करता.

7. भिक्षुक जीवन: उसने हिन्दू धर्म और महात्मा बुदध द्वारा दिखाए गए भिक्षुक जीवन के रास्ते को अपनाया था. रामपुर और अन्य गाँवों से उसे जो भी सूखा-कच्चा अनाज मिलता था, वो उसी से अपनी गुजर-बसर करता था. सोना, चांदी, बिरयानी या चिकन मलाई टिक्का की उसने कभी इच्छा ज़ाहिर नहीं की.

8. सामाजिक कार्य: डकैती के पेशे के अलावा वो छोटे बच्चों को सुलाने का भी काम करता था. सैकड़ों माताएं उसका नाम लेती थीं ताकि बच्चे बिना कलह किए सो जाएं. सरकार ने उसपर 50,000 रुपयों का इनाम घोषित कर रखा था. उस युग में 'कौन बनेगा करोड़पति' ना होने के बावजूद लोगों को रातों-रात अमीर बनाने का गब्बर का यह सच्चा प्रयास था.

9. महानायकों का निर्माता: अगर गब्बर नहीं होता तो जय और वीरू जैसे लुच्चे-लफंगे छोटी-मोटी चोरियां करते हुए स्वर्ग सिधार जाते. पर यह गब्बर के व्यक्तित्व का प्रताप था कि उन लफंगों में भी महानायक बनने की क्षमता जागी.

-- Kalingaa...

Is this really patriotism???

Snippet from "Is this really patriotism???" by Aakash Chopra at ESPNCricinfo.com
Post independence and the division of the country, we just carried forward the same sentiment i.e. sport being the vehicle to assert supremacy. The relations between India and Pakistan remained sour for the longest time. We've fought wars and still continue to have other equally important issues plaguing us. Yet, there's enough reason to believe that we as people, have matured and come a long way in trimming down that animosity, especially via Bollywood and numerous other cultural exchanges, perhaps reiterating time and again that the rivalry is only political. Or at least I'd like to believe that India has definitely evolved and has become a responsible nation. Unfortunately though, all it took was a cricket match to topple that process of evolution. Are we not, in a sense, pushing ourselves back a 100 years?
Complete Story:
http://www.espncricinfo.com/magazine/content/current/story/508967.html

-- Kalingaa..

Bitter Sweet Symphony - The Verve


'Cause it's a bittersweet symphony this life
Trying to make ends meet, you're a slave to the money then you die
I'll take you down the only road I've ever been down
You know the one that takes you to the places where all the veins meet, yeah
No change, I can't change, I can't change, I can't change,
but I'm here in my mold , I am here in my mold
But I'm a million different people from one day to the next
I can't change my mold, no, no, no, no, no

Well, I've never prayed,
But tonight I'm on my knees, yeah
I need to hear some sounds that recognize the pain in me, yeah
I let the melody shine, let it cleanse my mind , I feel free now
But the airwaves are clean and there's nobody singing to me now

No change, I can't change, I can't change, I can't change,
but I'm here in my mold , I am here with my mold
And I'm a million different people from one day to the next
I can't change my mold, no, no, no, no, no

(Well have you ever been down?)
(I can't change, I can't change...)

'Cause it's a bittersweet symphony this life
Trying to make ends meet, trying to find some money then you die
I'll take you down the only road I've ever been down
You know the one that takes you to the places where all the veins meet, yeah
You know I can't change, I can't change, I can't change,
but I'm here in my mold, I am here in my mold
And I'm a million different people from one day to the next
I can't change my mold, no,no,no,no,no

(It justs sex and violence melody and silence)
(I'll take you down the only road I've ever been down) (Been down) (Ever been down)
(Have you ever been down?)

Roshniyan...

हम तो चले थे अकेले ही राह-ए-मंजिल
अच्छा हुआ हमसफ़र तुम भी मिल गए...
पहले तो डरते थे कुछ अँधेरे हमसे
अब तो रोशनियों के दिल दहल गए...

Nigal Gaye Sab Samandar....

निगल गये सब के सब समंदर, ज़मीन बची अब कहीं नहीं है
बचाते हम अपनी जान जिस में, वो कश्ती अब तो कहीं नहीं है

वो आग बरसी है दोपहर की कई सारे मंज़र झुलस गये हैं
सुबह-सवेरे जो ताज़गी थी वो ताज़गी अब कहीं नहीं है

तुम अपने क़स्बों में जा के देखो वहाँ भी अब शहर ही बसे हैं
कि ढूँढते हो जो ज़िंदगी तुम वो ज़िंदगी अब कहीं नहीं है

बहुत दिनों बाद पाई फ़ुर्सत तो मैने खुद को पलट के देखा
मगर मैं पहचानता था जिस को वो आदमी अब कहीं नहीं है

गुज़र गया वक़्त दिल पे लिख के ना जाने कैसी अजीब बातें
पन्ने पलटता हूँ मैं जो दिल के तो सादगी अब कहीं नहीं है

- जावेद अख़्तर